
प्रगति नगर में भव्य आचार्य अभिनंदन समारोह, रोली-तिलक, श्रीफल और उपहार से सम्मानित हुए गुरुजन – राष्ट्र निर्माण में आचार्यों के योगदान को किया गया नमन

कोरबा। शिक्षक दिवस के अवसर पर सरस्वती शिशु मंदिर उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, प्रगति नगर में गुरु-शिष्य परंपरा और भारतीय ज्ञान संस्कृति की गौरवशाली विरासत का जीवंत दर्शन देखने को मिला। सर्वेश्वर शिक्षण समिति, जमनीपाली के तत्वावधान में आयोजित भव्य ‘आचार्य अभिनंदन समारोह’ में प्रगति नगर एवं जमनीपाली के विद्या मंदिरों के आचार्यों एवं दीदियों का श्रद्धा और सम्मान के साथ अभिनंदन किया गया।
समारोह की शुरुआत मां सरस्वती, ॐ, भारत माता एवं भारतरत्न डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के तैलचित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन, पुष्पार्चन एवं वैदिक स्वस्तिवाचन से हुई। छात्राओं की सरस्वती वंदना एवं गुरु-वंदना ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
एनटीपीसी के सहयोग से नवनिर्मित सभा-भवन को बताया मील का पत्थर

प्रबंधकारिणी समिति के अध्यक्ष सुरेंद्र कुमार राठौर ने अतिथियों का स्वागत करते हुए विद्यालय के विकास में एनटीपीसी कोरबा के योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि एनटीपीसी द्वारा सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत विद्यालय में निर्मित एवं सुसज्जित सभा-भवन विद्यार्थियों के बहुमुखी विकास के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा।
उन्होंने मुख्य अतिथि शत्रुघ्न बेहरा, महाप्रबंधक, प्रचालन एवं अनुरक्षण, एनटीपीसी कोरबा तथा विशिष्ट अतिथि विजय कुमार गर्ग, महाप्रबंधक, रसायन, एनटीपीसी कोरबा के प्रति विद्यालय परिवार की ओर से आभार व्यक्त किया।
“गुरु केवल शिक्षक नहीं, जीवन-शिल्पी हैं”
समिति के सचिव अमरदीपक देवांगन ने गुरु की महिमा और सनातन गुरु-शिष्य परंपरा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि गुरु केवल अक्षर ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि विद्यार्थी के अंतर्मन का अंधकार दूर कर उसे संस्कार, राष्ट्रप्रेम और नैतिक मूल्यों से जोड़ने वाला जीवन-शिल्पी है।
उन्होंने कहा कि आज जब समाज भौतिकता की दौड़ में तेजी से आगे बढ़ रहा है, ऐसे समय में विद्या भारती के आचार्यों का त्याग, निष्ठा और समर्पण समाज के लिए प्रकाशस्तंभ है। आचार्यों का सम्मान वास्तव में समाज द्वारा स्वयं को गौरवान्वित करना है।
चरित्र निर्माण ही शिक्षा का मूल उद्देश्य : शत्रुघ्न बेहरा
मुख्य अतिथि शत्रुघ्न बेहरा ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल पाठ्य-पुस्तकों का ज्ञान देना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में जीवन-मूल्यों और चरित्र का निर्माण करना है। उन्होंने कहा कि तकनीकी एवं औद्योगिक विकास तभी सार्थक है, जब समाज का नेतृत्व चरित्रवान नागरिकों के हाथों में हो। इस दिशा में आचार्यों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
संस्कार और ज्ञान के संतुलन पर विजय कुमार गर्ग का जोर
विशिष्ट अतिथि विजय कुमार गर्ग ने गुरु को ज्ञान, विचार और संस्कार के संतुलन का आधार बताया। उन्होंने कहा कि आधुनिक दौर की चुनौतियों के बीच विद्यार्थियों में राष्ट्रनिष्ठा, विनम्रता और आत्मसंयम जैसे संस्कार विकसित करना आचार्यों की बड़ी जिम्मेदारी है। विद्या भारती के आचार्य इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं।
“आचार्य राष्ट्र निर्माण के शिल्पकार” : जुड़ावन सिंह ठाकुर
मुख्य वक्ता जुड़ावन सिंह ठाकुर, उपाध्यक्ष, विद्या भारती मध्य क्षेत्र ने सनातन ऋषि परंपरा में गुरु के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि आचार्य अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाला होता है।
उन्होंने कहा कि विद्या भारती का उद्देश्य केवल प्रमाणपत्र देना नहीं, बल्कि व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण करना है। आचार्यों का अभिनंदन उनके निःस्वार्थ सेवा, त्याग, साधना और राष्ट्र निर्माण में योगदान के प्रति समाज की कृतज्ञता का प्रतीक है।
रोली-तिलक, श्रीफल और उपहार से हुआ सम्मान
समारोह के मुख्य चरण में दोनों विद्यालयों के समस्त आचार्यों एवं दीदियों का रोली-तिलक लगाकर, श्रीफल एवं उपहार भेंट कर सम्मान किया गया। गुरुजनों के सम्मान के दौरान पूरा परिसर करतल ध्वनि से गूंज उठा। विद्यार्थियों और उपस्थित नागरिकों ने आचार्यों के प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता व्यक्त की।
कार्यक्रम में सर्वेश्वर शिक्षण समिति के पदाधिकारी, स्थानीय प्रबंध समिति के सदस्य, विद्यालय परिवार एवं बड़ी संख्या में प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित रहे।
अंत में विश्व कल्याण की भावना से शांति मंत्र का उच्चारण किया गया और राष्ट्रगान के साथ समारोह का समापन हुआ। आयोजन ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि संस्कारवान और चरित्रवान पीढ़ी के निर्माण में गुरु की भूमिका केवल शिक्षक की नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य के शिल्पकार की है।
![]() | ![]() | ![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |
![]() |









































