जनता शिकायत करे, पत्रकार मुद्दा उठाएं, खबरें प्रकाशित हों,फिर भी कार्रवाई नहीं तो आखिर किसके लिए हैं ये शिकायत मंच?
रायपुर/कोरबा/छत्तीसगढ़। जनता की समस्याओं के त्वरित निराकरण, प्रशासन को जवाबदेह बनाने और आम नागरिक को शासन तक अपनी बात पहुंचाने के लिए मुख्यमंत्री जनदर्शन, मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 और जिला स्तर पर कलेक्टर जनदर्शन जैसी व्यवस्थाएं संचालित की जा रही हैं। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य बेहद स्पष्ट है—जनता की शिकायत सुनी जाए, उसकी जांच हो और पात्र मामलों में समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
लेकिन जब कोई नागरिक अपनी समस्या लेकर इन मंचों तक पहुंचता है, शिकायत दर्ज कराता है, संबंधित विभागों के चक्कर काटता है और इसके बावजूद समस्या जस की तस बनी रहती है, तब सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—क्या शिकायत दर्ज होना ही समाधान मान लिया गया है?
और इससे भी गंभीर स्थिति तब बनती है, जब किसी मामले को पत्रकार जनहित का मुद्दा मानकर प्रमुखता से प्रकाशित करते हैं, संबंधित अधिकारियों के संज्ञान में मामला लाते हैं, दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर सवाल उठाते हैं, लेकिन उसके बाद भी धरातल पर कोई ठोस कार्रवाई दिखाई नहीं देती।
शिकायत दर्ज हुई, नंबर मिला… लेकिन समाधान कहां है?
आम नागरिक के लिए शिकायत दर्ज कराना कोई छोटी प्रक्रिया नहीं होती। वह अपनी समस्या लेकर कार्यालयों के चक्कर लगाता है, आवेदन देता है, दस्तावेज लगाता है और उम्मीद करता है कि शासन-प्रशासन उसकी बात सुनेगा।
यदि शिकायत मुख्यमंत्री जनदर्शन या हेल्पलाइन तक पहुंचती है तो आम धारणा यही होती है कि अब उसकी समस्या पर उच्च स्तर से निगरानी होगी।
लेकिन यदि शिकायत आगे बढ़कर फिर उसी विभाग, उसी कार्यालय और उन्हीं अधिकारियों की टेबल तक लौट आए, जिनके खिलाफ शिकायत की गई है, और अंत में केवल “निराकरण किया गया” जैसे शब्दों के साथ मामला बंद कर दिया जाए, जबकि शिकायतकर्ता की वास्तविक समस्या बनी रहे,तो यह व्यवस्था की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
सवाल यह नहीं कि कितनी शिकायतें दर्ज हुईं।
सवाल यह है कि कितनी शिकायतों का वास्तविक समाधान हुआ?
कागज पर निराकरण और जमीन पर समाधान में अंतर
प्रशासनिक व्यवस्था में शिकायतों के निराकरण की रिपोर्ट बन सकती है। पोर्टल पर स्टेटस अपडेट हो सकता है। संबंधित विभाग अपनी रिपोर्ट भी भेज सकता है।
लेकिन जनता का सवाल इससे आगे का है
क्या शिकायतकर्ता संतुष्ट है?
क्या समस्या वास्तव में समाप्त हुई?
क्या दोषी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई हुई?
क्या सरकारी व्यवस्था में सुधार हुआ?
क्या शिकायत दोबारा उसी कारण से सामने नहीं आई?
यदि इन सवालों का जवाब नहीं है तो फिर केवल पोर्टल पर शिकायत का स्टेटस बदल देना जनता के लिए समाधान नहीं माना जा सकता।
जब पत्रकारों की खबर भी प्रशासन को नहीं झकझोर पाए तो?
लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ कहा जाता है। पत्रकारों का काम केवल खबर प्रकाशित करना नहीं, बल्कि जनता की आवाज को शासन-प्रशासन तक पहुंचाना भी है।जब किसी नागरिक की शिकायत उचित तथ्यों और दस्तावेजों के साथ सामने आती है और मीडिया उसे जनहित का विषय मानकर प्रकाशित करता है, तो उम्मीद रहती है कि संबंधित विभाग स्वतः संज्ञान लेकर मामले की जांच करेगा। लेकिन यदि शिकायत भी हुई,जनदर्शन भी हुआ,हेल्पलाइन पर शिकायत भी हुई,मीडिया में खबर भी प्रकाशित हुई,अधिकारी संज्ञान लेने की बात भी करें,फिर भी कार्रवाई दिखाई न दे तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठेगा कि आखिर शिकायत निवारण की पूरी व्यवस्था किस उद्देश्य से संचालित हो रही है?
क्या जनता को सिर्फ शिकायत नंबर चाहिए या न्याय भी?
सरकार द्वारा शिकायत निवारण की व्यवस्था बनाने का उद्देश्य जनता को केवल एक शिकायत क्रमांक देना नहीं हो सकता।
आम आदमी को शिकायत नंबर नहीं, समाधान चाहिए
उसे पोर्टल पर “निराकृत” लिखे होने से ज्यादा जरूरी है कि उसके घर, खेत, सड़क, नाली, बिजली, पानी, राजस्व, राशन, रोजगार, भ्रष्टाचार या प्रशासनिक समस्या का वास्तविक समाधान हो।
यदि शिकायतकर्ता बार-बार वही समस्या लेकर अधिकारियों के पास जाता रहे और हर बार उसे नई शिकायत दर्ज कराने की सलाह दी जाए, तो यह व्यवस्था के प्रति जनता के भरोसे को कमजोर करता है।
जवाबदेही आखिर तय होगी या फाइल बंद कर दी जाएगी?
किसी भी शिकायत व्यवस्था की असली परीक्षा उस समय होती है, जब शिकायत किसी प्रभावशाली व्यक्ति, अधिकारी, संस्था या विभाग के खिलाफ हो।
क्या ऐसी शिकायतों में भी समान गंभीरता से जांच होती है?
क्या शिकायतकर्ता को जांच रिपोर्ट उपलब्ध कराई जाती है?
क्या कार्रवाई की स्पष्ट जानकारी दी जाती है?
क्या दोष सिद्ध होने पर जिम्मेदारी तय होती है?
या फिर मामला विभागीय पत्राचार, रिपोर्ट और जवाबी कार्रवाई के बीच उलझकर धीरे-धीरे फाइलों में दब जाता है?
अगर शिकायत पर कार्रवाई नहीं हुई तो जिम्मेदार कौन?
यह सवाल केवल शिकायतकर्ता का नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था का है।
जनदर्शन की गरिमा तभी बचेगी जब शिकायतकर्ता को न्याय मिलेगा
मुख्यमंत्री जनदर्शन हो या कलेक्टर जनदर्शन—इनका महत्व तभी है जब आम नागरिक को यह विश्वास हो कि उसकी बात वास्तव में सुनी जा रही है।
जनदर्शन लोकतंत्र में जनता और सरकार के बीच सीधे संवाद का माध्यम है। लेकिन यदि जनता वहां अपनी पीड़ा सुनाकर वापस लौटे और महीनों बाद भी समस्या का समाधान न हो, तो निराशा पैदा होना स्वाभाविक है।
जनदर्शन फोटो खिंचाने का कार्यक्रम नहीं, जवाबदेही का मंच होना चाहिए।
इसी तरह हेल्पलाइन केवल कॉल रिसीव करने की व्यवस्था नहीं, बल्कि समस्या के अंतिम समाधान तक निगरानी करने वाली व्यवस्था होनी चाहिए।
मीडिया की खबरों पर भी संज्ञान नहीं तो फिर प्रशासन किसका इंतजार कर रहा?
कई मामलों में पत्रकार किसी समस्या को सामने लाते हैं क्योंकि आम नागरिक की आवाज संबंधित विभाग तक नहीं पहुंच पाती। खबर प्रकाशित होने के बाद उम्मीद रहती है कि प्रशासन मामले की गंभीरता को समझेगा।
लेकिन यदि खबर प्रकाशित होने के बाद भी संबंधित विभाग की ओर से कोई स्पष्ट जांच, कार्रवाई या जवाब सामने नहीं आता तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या प्रशासन को कार्रवाई के लिए केवल शिकायत पोर्टल का इंतजार रहता है?
क्या समाचार पत्रों और न्यूज़ पोर्टलों में प्रकाशित जनहित के मुद्दे प्रशासन के लिए महत्वहीन हैं?
क्या अधिकारी स्वतः संज्ञान लेकर जांच नहीं कर सकते?
और सबसे बड़ा सवाल
“जनता आखिर अपनी समस्या लेकर जाए तो जाए कहां?”
यदि मुख्यमंत्री तक शिकायत पहुंचाने की व्यवस्था है, हेल्पलाइन है, कलेक्टर जनदर्शन है, विभागीय अधिकारी हैं और मीडिया भी जनता की आवाज उठा रहा है, फिर भी किसी वास्तविक समस्या का समाधान नहीं होता, तो यह पूरी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
सिर्फ आंकड़ों से नहीं, परिणाम से मापी जाए शिकायत व्यवस्था। सरकार को यह देखना होगा कि शिकायतों की संख्या कितनी है, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि….
- कितनी शिकायतों का वास्तविक समाधान हुआ?
- कितनी शिकायतों में मौके पर जांच हुई?
- कितनी शिकायतों में जिम्मेदारी तय की गई?
- कितने मामलों में दोषी पाए गए अधिकारियों/कर्मचारियों/संस्थानों पर कार्रवाई हुई?
- कितनी शिकायतें बार-बार दोहराई गईं?
- कितनी शिकायतों में शिकायतकर्ता वास्तव में संतुष्ट हुआ?
- कितने मामलों में केवल कागजी निराकरण कर शिकायत बंद की गई?
यही आंकड़े बताएंगे कि शिकायत निवारण व्यवस्था वास्तव में कितनी प्रभावी है।
सरकार को आत्ममंथन की जरूरत
जनता सरकार से चमत्कार नहीं मांगती। जनता केवल यह चाहती है कि उसकी बात सुनी जाए, निष्पक्ष जांच हो और यदि शिकायत सही है तो कार्रवाई की जाए।
यदि कोई शिकायत गलत है तो प्रशासन स्पष्ट रूप से बताए कि शिकायत क्यों गलत है।लेकिन न तो जांच, न स्पष्ट जवाब और न कार्रवाई,यह स्थिति जनता के भरोसे के लिए सबसे ज्यादा नुकसानदायक है। सरकार चाहे किसी भी दल की हो, प्रशासनिक व्यवस्था जनता के प्रति जवाबदेह होनी चाहिए।
अब सवाल मुख्यमंत्री और प्रशासन से
मुख्यमंत्री जनदर्शन, मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 और कलेक्टर जनदर्शन को लेकर सरकार को जनता के सामने स्पष्ट करना चाहिए कि शिकायतों के वास्तविक निराकरण की निगरानी कैसे होती है।
क्या केवल विभागीय रिपोर्ट के आधार पर शिकायत बंद की जाती है या शिकायतकर्ता की संतुष्टि भी जांची जाती है?
क्या मीडिया में प्रकाशित गंभीर जनहित के मामलों पर स्वतः संज्ञान की कोई प्रभावी व्यवस्था है?
क्या बार-बार शिकायत के बावजूद समस्या कायम रहने पर संबंधित अधिकारी की जवाबदेही तय होती है?
और यदि किसी मामले में शिकायत सही पाई जाती है लेकिन कार्रवाई नहीं होती, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
जनता को दिखावा नहीं, परिणाम चाहिए
लोकतंत्र में सबसे बड़ा भरोसा जनता का होता है। शिकायत निवारण की व्यवस्था उस भरोसे को मजबूत करने के लिए बनाई जाती है।
अगर शिकायत सुनना है तो समाधान भी करना होगा।
अगर जनदर्शन लगाना है तो जनता की पीड़ा पर कार्रवाई भी करनी होगी।
अगर हेल्पलाइन शुरू करनी है तो शिकायत को अंत तक ट्रैक भी करना होगा।
और अगर मीडिया जनता की आवाज उठा रहा है तो उस आवाज को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
वरना सवाल उठेंगे, उठते रहेंगे
क्या मुख्यमंत्री जनदर्शन, हेल्पलाइन 1076 और कलेक्टर जनदर्शन जनता की समस्याओं के समाधान का प्रभावी माध्यम हैं या केवल सरकारी प्रचार-प्रसार का हिस्सा बनकर रह गए हैं?
सरकार को इसका जवाब आंकड़ों से नहीं, धरातल पर हुए वास्तविक काम से देना होगा।
क्योंकि जनता को “शिकायत निराकृत” का संदेश नहीं चाहिए, जनता को अपनी समस्या का वास्तविक समाधान चाहिए।





