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छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग: न्याय और गरिमा के 25 वर्ष (2001-2026)

आधी आबादी के अधिकारों का प्रहरी: एक ऐतिहासिक गौरव यात्रा

रायपुर/24 मार्च 2026/ आज 24 मार्च है और यह केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं है, बल्कि छत्तीसगढ़ की लाखों महिलाओं के लिए ‘स्वावलंबन और सुरक्षा’ के नए युग का सूर्योदय था। आज जब हम इस स्थापना दिवस को मना रहे हैं, तो यह संस्थान केवल एक सरकारी निकाय का जन्मदिन नहीं है, बल्कि प्रदेश की लाखों महिलाओं के विश्वास और संघर्ष की विजय का प्रतीक है।

छत्तीसगढ़ राज्य के गठन (1 नवंबर 2000) के महज कुछ ही महीनों बाद, शासन ने यह दूरगामी निर्णय लिया कि प्रदेश की महिलाओं की विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों (जैसे टोनही प्रताड़ना, घरेलू हिंसा और कार्यस्थल पर उत्पीड़न) से निपटने के लिए एक सशक्त और स्वायत्त संस्था की आवश्यकता है।

छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग अधिनियम, 1995 के प्रावधानों के तहत 24 मार्च 2001 को इसका गठन किया गया।

मुख्य उद्देश्य: महिलाओं के संवैधानिक और कानूनी हितों की रक्षा करना, उनके विरुद्ध होने वाले भेदभाव को रोकना और शासन को महिला कल्याण हेतु नीतिगत सुझाव देना।

इन 25 वर्षों में आयोग ने केवल एक ‘शिकायत केंद्र’ से ऊपर उठकर एक ‘न्याय के मंदिर’ की छवि बनाई है। आयोग ने अपनी कार्यप्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव करते हुए न्याय को सुलभ बनाया:

जिला स्तरीय जनसुनवाई: आयोग ने राजधानी रायपुर के कमरों से बाहर निकलकर प्रदेश के हर जिले में ‘जनसुनवाई’ के माध्यम से पीड़ितों के करीब पहुँचकर मौके पर ही निराकरण की पहल की।

महतारी न्याय रथ: यह छत्तीसगढ़ का एक अभिनव और सफल प्रयोग रहा है। इस रथ के माध्यम से ग्रामीण अंचलों में लघु फिल्मों और विशेषज्ञों के जरिए महिलाओं को घरेलू हिंसा अधिनियम, धारा 498A और संपत्ति में अधिकार जैसे कानूनी विषयों पर जागरूक किया गया।

कार्यस्थल पर सुरक्षा (POSH Act): कार्यस्थलों पर लैंगिक उत्पीड़न को रोकने और महिलाओं के लिए सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करने में आयोग की भूमिका निर्णायक और ऐतिहासिक रही है।

छत्तीसगढ़ की सामाजिक संरचना में महिलाओं की भागीदारी हमेशा से अग्रणी रही है, लेकिन आयोग ने उन्हें एक मजबूत कानूनी सुरक्षा कवच प्रदान किया है:

त्वरित न्याय: हजारों लंबित मामलों का आपसी सुलह, काउंसलिंग या सख्त कानूनी कार्रवाई के जरिए त्वरित निराकरण किया गया।

कुरीतियों पर प्रहार: टोनही प्रताड़ना जैसे अंधविश्वासों और सामाजिक कुप्रथाओं के खिलाफ आयोग ने हमेशा कड़ा रुख अपनाया है।

पारिवारिक सामंजस्य: आयोग ने केवल दंड देने पर ही जोर नहीं दिया, बल्कि काउंसलिंग के माध्यम से टूटते हुए हजारों परिवारों को फिर से जोड़ने का पुण्य कार्य भी किया है।

आज के डिजिटल युग में आयोग ने अपनी पहुंच को और भी आसान बना दिया है। अब न्याय के लिए लंबी दूरी तय करना अनिवार्य नहीं है। आयोग ने पीड़ितों की सुविधा के लिए आधुनिक संचार माध्यमों को अपनाया है:

ईमेल द्वारा शिकायत: पीड़ित महिलाएं अपनी समस्या सीधे आयोग की आधिकारिक ईमेल आईडी पर भेज सकती हैं।

व्हाट्सएप हेल्पलाइन: त्वरित संचार और तत्काल सहायता के लिए व्हाट्सएप के माध्यम से शिकायत दर्ज करने और जानकारी प्राप्त करने की सुविधा उपलब्ध कराई गई है। इससे सुदूर अंचलों की महिलाएं भी बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी बात रख पा रही हैं।

विशेष उपलब्धि: रजत जयंती वर्ष पर ‘महा जनसुनवाई’ का कीर्तिमान
स्थापना के 25वें वर्ष के इस ऐतिहासिक पड़ाव को आयोग ने केवल उत्सव तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे ‘महा जनसुनवाई सप्ताह’ के रूप में सेवा और न्याय को समर्पित किया। इस विशेष अभियान के तहत प्रदेश के पांचों संभागों और 33 जिलों में हजारों लंबित प्रकरणों का एक साथ निराकरण कर पीड़ितों को त्वरित न्याय दिलाने का नया कीर्तिमान रचा गया। रजत जयंती के अवसर पर आयोजित यह महा-अभियान महिला सशक्तिकरण की दिशा में आयोग की अटूट प्रतिबद्धता और कार्यकुशलता का जीवंत प्रमाण है, जिसने ‘न्याय आपके द्वार’ की अवधारणा को धरातल पर सच कर दिखाया है।

आज स्थापना दिवस के इस गौरवशाली अवसर पर, हम छत्तीसगढ़ की प्रत्येक माता, बहन और बेटी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ देते हैं। हमारा संकल्प है कि छत्तीसगढ़ का कोना-कोना महिलाओं के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक बने।

“आयोग का ध्येय केवल सजा दिलाना नहीं, बल्कि एक ऐसे समतामूलक समाज का निर्माण करना है जहाँ महिलाएँ भयमुक्त होकर अपनी गरिमा के साथ जी सकें।”

डॉ. किरणमयी नायक
अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग
(कैबिनेट मंत्री दर्जा), छत्तीसगढ़ शासन

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