
ऊर्जाधानी कोरबा में बिजली व्यवस्था की ‘बत्ती गुल’!
24 घंटे में 18 घंटे तक बिजली गुल होने के आरोप, डीओ चढ़ाने के लिए 25-30 घंटे तक इंतजार! बढ़ी बिजली दरों के बीच सुविधाएं नदारद, पावर हब के लोग ही अंधेरे में

शिकायत का समाधान नहीं फिर भी सूचित किया जाता है आपका समस्या का समाधान हो गया है,आखिर ऐसा झूठा सूचना देने के पीछे मंशा क्या?
कोरबा। देश और प्रदेश को रोशन करने वाली ऊर्जाधानी कोरबा खुद अंधेरे से जूझ रही है। जिले में विद्युत आपूर्ति की लचर व्यवस्था को लेकर अब आम लोगों का गुस्सा फूटने लगा है। कहीं घंटों बिजली गुल है तो कहीं डीओ चढ़ाने के लिए भी 25 से 30 घंटे तक इंतजार करना पड़ रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है—जब बिजली दरें लगातार बढ़ाई जा रही हैं तो उपभोक्ताओं को निर्बाध बिजली की सुविधा आखिर कब मिलेगी?
मुख्यमंत्री से जनता का सीधा सवाल—ये कैसा सुशासन?
प्रदेश सरकार सुशासन की बात करती है, लेकिन ऊर्जाधानी की जनता बिजली जैसी बुनियादी सुविधा के लिए परेशान हो तो सवाल उठना लाजिमी है। जनता मुख्यमंत्री से पूछ रही है—जब ऊर्जा विभाग भी आपके ही अधीन है, तो कोरबा की विद्युत व्यवस्था आखिर क्यों नहीं सुधर रही?
जिले में कई इलाकों में लंबे समय तक बिजली बंद रहने की शिकायतें सामने आ रही हैं। स्थानीय जनता द्वारा भी विद्युत विभाग के उच्चाधिकारियों को शिकायतें दी जा रही हैं। बावजूद इसके यदि समस्या जस की तस बनी हुई है तो जिम्मेदार कौन है?
बिल बकाया है तो कार्रवाई करें, मगर बिजली व्यवस्था तो सुधारें!
बिजली बिल बकाया रखने वाले कार्यालय तथा उपभोक्ताओं पर कार्रवाई होनी चाहिए—इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन क्या कार्रवाई का दूसरा पक्ष भी नहीं होना चाहिए?
जब उपभोक्ता समय पर बढ़ी हुई बिजली दरों का भुगतान कर रहा है तो उसे विश्वसनीय और निर्बाध विद्युत आपूर्ति मिलना भी विभाग की जिम्मेदारी है। जनता का सवाल साफ है—‘बिल वसूली में विभाग सख्त, लेकिन बिजली आपूर्ति में इतना लाचार क्यों?’
मैदानी अमला कम, समस्या ज्यादा—भर्ती कब होगी?
विद्युत व्यवस्था की जमीनी हकीकत का एक बड़ा सवाल मैदानी कर्मचारियों की कमी से भी जुड़ा है। लगातार बढ़ते उपभोक्ता और विस्तारित बिजली नेटवर्क के बीच यदि पर्याप्त कर्मचारी ही नहीं होंगे तो फॉल्ट सुधारने से लेकर नियमित रखरखाव तक की व्यवस्था प्रभावित होना स्वाभाविक है।
देश-प्रदेश को रोशन करने वाले पावर हब में ही यदि कर्मचारी और संसाधनों की कमी के कारण जनता अंधेरे में रहे तो इससे बड़ी विडंबना क्या होगी?
स्थानीय जनप्रतिनिधि आखिर कब जागेंगे?
सबसे बड़ा सवाल स्थानीय जनप्रतिनिधियों से भी है। क्या जनता की बिजली समस्या उन्हें दिखाई नहीं दे रही? क्या बार-बार बिजली गुल होने और घंटों इंतजार करने वाले परिवारों की परेशानी उनके संज्ञान में नहीं है?
जनता पूछ रही है—क्या जनप्रतिनिधि भी कुंभकर्णीय नींद में सो रहे हैं?
अब जरूरत सिर्फ बयानबाजी की नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने और जमीन पर व्यवस्था सुधारने की है। ऊर्जाधानी कोरबा की जनता बिजली के लिए तरसने को मजबूर है और जिम्मेदार तंत्र अगर अब भी नहीं जागा तो बिजली संकट जनआक्रोश में बदल सकता है।
कोरबा की जनता के सवाल
24 घंटे में घंटों बिजली गुल होने की नौबत क्यों?
डीओ चढ़ाने के लिए 25-30 घंटे तक इंतजार क्यों?
शिकायत का समाधान नहीं फिर भी सूचित किया जाता है आपका समस्या का समाधान हो गया है,आखिर ऐसा झूठा सूचना देने के पीछे मंशा क्या?
बढ़ी हुई बिजली दरों के बदले उपभोक्ताओं को बेहतर सुविधा कब?
मैदानी विद्युत कर्मचारियों की भर्ती कब होगी?
फॉल्ट और बिजली कटौती के लिए जवाबदेही किसकी तय होगी?
ऊर्जाधानी के लोगों को ही अंधेरे से कब मुक्ति मिलेगी?
स्थानीय जनप्रतिनिधि जनता की इस समस्या पर कब सड़क से सदन तक आवाज उठाएंगे?
ऊर्जाधानी का सवाल सीधा है—बिजली पैदा करने वाले कोरबा को ही अगर बिजली के लिए घंटों इंतजार करना पड़े, तो फिर इसे सुशासन कहें या व्यवस्था की विफलता?
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