
कोरबा। शहर को सुंदर बनाने की कवायद के बीच बुधवारी बाईपास में नगर निगम की कार्रवाई बुधवार को विवादों में घिर गई। ग्रीन बेल्ट निर्माण के नाम पर वर्षों से ठेला लगाकर परिवार का पालन-पोषण कर रही एक महिला को हटाने पहुंची निगम की टीम को उस समय विरोध का सामना करना पड़ा, जब महिला जेसीबी के सामने बैठ गई। देखते ही देखते मौके पर लोगों की भीड़ जुट गई और निगम प्रशासन के खिलाफ नाराजगी खुलकर सामने आने लगी।
महिला का कहना था कि वह वर्षों से इसी स्थान पर मेहनत-मजदूरी कर अपने परिवार का पेट पाल रही है। उसने अधिकारियों के सामने पुराने दस्तावेज भी रखे और सवाल किया कि “क्या शहर को सुंदर बनाने का मतलब गरीबों की रोज़ी-रोटी छीन लेना है? यदि हटाना ही है तो पहले हमें वैकल्पिक स्थान और रोजगार की व्यवस्था दी जाए।”

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि नगर निगम के पास कार्रवाई के लिए पर्याप्त समय था और करीब एक माह पहले नोटिस भी दिया गया था, तो प्रभावित लोगों के पुनर्वास की व्यवस्था पहले क्यों नहीं की गई? क्या केवल नोटिस देकर प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकता है?

मौके पर मौजूद लोगों का आरोप था कि निगम अमला गरीबों के प्रति संवेदनशील रवैया अपनाने के बजाय जेसीबी लेकर सीधे कार्रवाई करने पहुंच गया। इससे यह संदेश गया कि शहर का सौंदर्यीकरण गरीबों की कीमत पर किया जा रहा है।
बताया गया विवाद बढ़ने की सूचना पर नगर निगम आयुक्त आशुतोष पांडेय स्वयं भी मौके पर पहुंचे। महिला के विरोध और लोगों की नाराजगी को देखते हुए उन्होंने संबंधित ठेले को हटाने के लिए तीन दिन की अतिरिक्त मोहलत देने के निर्देश दिए।
यहीं से कई सवाल खड़े हो गए। यदि कार्रवाई पूरी तरह उचित और तत्काल आवश्यक थी तो मौके पर ही तीन दिन की राहत क्यों देनी पड़ी? क्या इसका मतलब है कि प्रभावित पक्ष की बात पहले सुनी ही नहीं गई थी? यदि तीन दिन का समय दिया जा सकता था तो यह निर्णय पहले क्यों नहीं लिया गया?
शहर के विकास और सौंदर्यीकरण का विरोध शायद ही कोई करता हो, लेकिन विकास का मॉडल ऐसा भी नहीं होना चाहिए जिसमें सबसे पहले गरीब की रोज़ी-रोटी पर चोट पहुंचे। जानकार भी मानते हैं कि अतिक्रमण हटाने जैसी कार्रवाई के साथ पुनर्वास की स्पष्ट योजना होना आवश्यक है, ताकि किसी परिवार की आजीविका अचानक समाप्त न हो।
बुधवारी बाईपास की यह घटना केवल एक अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई नहीं, बल्कि विकास और मानवीय संवेदनाओं के बीच संतुलन का बड़ा सवाल बन गई है। अब देखना होगा कि तीन दिन बाद नगर निगम केवल बुलडोज़र चलाएगा या प्रभावित परिवारों के लिए कोई सम्मानजनक वैकल्पिक व्यवस्था भी करेगा।
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