
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल शादीशुदा होने के आधार पर किसी बेटी को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि यह मान लेना कि शादी के बाद बेटी केवल अपने पति पर निर्भर होती है, कानून की दृष्टि में उचित नहीं है। निर्भरता एक तथ्यात्मक विषय है, जिसका निर्धारण प्रत्येक मामले के तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।
मामला बैंक ऑफ महाराष्ट्र में डिप्टी मैनेजर रहे एक कर्मचारी की मृत्यु के बाद उनकी बेटी द्वारा अनुकंपा नियुक्ति के लिए किए गए आवेदन से जुड़ा था। बैंक ने आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि याचिकाकर्ता शादीशुदा है, इसलिए उसे अपने पति पर आश्रित माना जाएगा और वह दिवंगत कर्मचारी के आश्रित परिवार की सदस्य नहीं मानी जा सकती।
हाईकोर्ट ने बैंक की अनुकंपा नियुक्ति नीति का परीक्षण करते हुए पाया कि “आश्रित परिवार के सदस्य” की परिभाषा में बेटी को शामिल किया गया है और इसमें शादीशुदा तथा अविवाहित बेटी के बीच कोई भेद नहीं किया गया है। कोर्ट ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता ने आवेदन में स्पष्ट रूप से बताया था कि वह आर्थिक रूप से अपने पिता पर निर्भर थी, जबकि बैंक इसकी विपरीत कोई ठोस सामग्री प्रस्तुत नहीं कर सका।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर शादीशुदा बेटियों को अनुकंपा नियुक्ति से बाहर रखना लैंगिक भेदभाव पर आधारित रूढ़िवादी सोच है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 15(1) का उल्लंघन करता है। कोर्ट ने इसे मनमाना और असंवैधानिक करार दिया।
अदालत ने बैंक ऑफ महाराष्ट्र को निर्देश दिया है कि वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले और प्रासंगिक नियमों को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ता के अनुकंपा नियुक्ति के आवेदन पर 30 दिनों के भीतर नए सिरे से विचार करे। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों में शादीशुदा बेटियों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।
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