
कभी चाय की मिठास बढ़ाने वाली शक्कर अब घर के बजट में कड़वाहट घोलने लगी है। बाजार में शक्कर की कीमत 75 से 80 रुपये किलो तक पहुंचने से गृहिणियों की रसोई का गणित बिगड़ गया है। बढ़ती कीमतों ने आम परिवारों की चिंता बढ़ा दी है और सवाल उठ रहा है कि आखिर रोजमर्रा की जरूरत की वस्तुओं की कीमतों पर लगाम कब लगेगी?
शक्कर के बढ़ते दाम को लेकर इथेनॉल नीति को भी राजनीतिक बहस के केंद्र में लाया जा रहा है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की इथेनॉल संबंधी नीतियों को लेकर राजनीतिक हलकों में सवाल और आरोप लगाए जा रहे हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि किए बिना उन्हें तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
वहीं, पार्टी के भीतर भी कुछ कार्यकर्ताओं द्वारा दबी जुबान में महंगाई और इथेनॉल नीति को लेकर आलोचना किए जाने की चर्चा है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार की नीतियों का असर यदि सीधे आम आदमी की रसोई पर दिखाई देने लगे तो इसका जवाब देना जरूरी है।
गृहिणियों की जेब पर सीधा वार
शक्कर ऐसी वस्तु है जिसका इस्तेमाल लगभग हर घर में रोजाना होता है। चाय, मिठाई, नाश्ता और घरेलू पकवानों में इसकी जरूरत के चलते कीमत बढ़ने का असर सीधे मासिक बजट पर पड़ता है। गृहिणियों का कहना है कि पहले ही तेल, दाल, सब्जियों और अन्य घरेलू सामान की कीमतों ने बजट बिगाड़ रखा है, ऐसे में शक्कर के दाम में उछाल ने परेशानी और बढ़ा दी है।
सवाल सिर्फ शक्कर का नहीं, रसोई की पूरी अर्थव्यवस्था का है
महंगाई पर राजनीतिक बयानबाजी अपनी जगह है, लेकिन आम उपभोक्ता के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है—रसोई का खर्च आखिर कब कम होगा? यदि किसी नीति का उद्देश्य किसानों और अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंचाना है तो उसके साथ यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि उसका बोझ आम उपभोक्ता की थाली और जेब पर असामान्य रूप से न पड़े।
75-80 रुपये किलो शक्कर की कीमत ने एक बार फिर महंगाई के मुद्दे को घर-घर की चर्चा बना दिया है। अब निगाह सरकार पर है कि वह बढ़ती कीमतों पर क्या कदम उठाती है और आम परिवारों को राहत कब मिलती है।
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