
कोरबा,दर्री । शहर के मुख्य मार्गों, चौक- चौराहों और वीआईपी इलाकों के सौंदर्यीकरण की चमक-दमक के बीच उपनगरों के उद्यान अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि लगता है नगर निगम के विकास का नक्शा शहर की सीमा पर पहुंचते ही समाप्त हो जाता है।
उपनगरों में बने कई उद्यान आज झूले टूटने, घास सूखने और सफाई के अभाव से जूझ रहे हैं। बच्चों के खेलने की जगह अब आवारा पशुओं का ठिकाना बनती जा रही है। लेकिन जिम्मेदारों की नजर शायद अब तक इन उद्यानों तक नहीं पहुंच पाई है।

रहवासी कह रहें हैं कि “आयुक्त साहब यदि शहर के बड़े-बड़े सौंदर्यीकरण कार्यों और फोटो सेशन से थोड़ा समय निकाल लें, तो उपनगरों के इन उद्यानों की सुध भी ले लें।” साहब जरा शहर से बाहर भी निकलिए… उपनगर के पार्क आपका इंतजार कर रहे हैं!आखिर टैक्स देने वाले उपनगर के निवासी भी उसी नगर निगम का हिस्सा हैं, जिसके विकास के दावे अक्सर खबरों में दिखाई देते हैं।


लोगों का कहना है कि जब शहर के प्रमुख स्थानों पर करोड़ों रु. खर्च कर रंग-रोगन और सजावट की जा सकती है, तो उप नगर में बच्चों और बुजुर्गों के लिए बने उद्यानों को व्यवस्थित रखने में आखिर बाधा क्या है? या फिर विकास की रोशनी केवल उन्हीं जगहों तक सीमित है, जहां अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों का नियमित आना-जाना रहता है?


फिलहाल उपनगर के रहवासी निगम प्रशासन से यही उम्मीद लगाए बैठे हैं कि कभी किसी फाइल, बैठक या निरीक्षण के दौरान इन उद्यानों का नाम भी याद आ जाए और यहां भी सौंदर्यीकरण की बयार बह सके। क्योंकि विकास तभी सार्थक कहलाएगा, जब शहर के साथ-साथ उपनगरों की भी तस्वीर बदलेगी।
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