
कोरबा। देश की ऊर्जाधानी कहे जाने वाले कोरबा की तस्वीर आज कई बुनियादी सवाल खड़े कर रही है। जहां एक ओर यहां के विशाल ताप विद्युत संयंत्र पूरे देश को रोशन करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कोरबा शहर के अनेक हिस्से आज भी मूलभूत सुविधाओं के अभाव, अव्यवस्था और जनसमस्याओं से जूझ रहे हैं। यह स्थिति “दिया तले अंधेरा” कहावत को चरितार्थ करती नजर आती है।
कोरबा की पहचान देश के प्रमुख विद्युत उत्पादन केंद्र के रूप में है। यहां से निकलने वाली बिजली करोड़ों लोगों के घरों को रोशन करती है, लेकिन स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि उन्हें ही बार-बार बिजली कटौती, जर्जर सड़कें, जलभराव, प्रदूषण, धूल और बदहाल नागरिक सुविधाओं का सामना करना पड़ रहा है।
बरसात के मौसम में कई कॉलोनियों और मुख्य मार्गों पर जलभराव आम बात हो गई है। सीवर व्यवस्था की खामियां और खराब सड़कें लोगों की परेशानी बढ़ा रही हैं। वहीं उद्योगों और खदानों से निकलने वाली धूल व प्रदूषण का असर आमजन के स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस शहर की बदौलत देश का बड़ा हिस्सा रोशन होता है, क्या उसी शहर को बेहतर सड़कें, निर्बाध बिजली, स्वच्छ वातावरण और गुणवत्तापूर्ण नागरिक सुविधाएं मिलना उसका अधिकार नहीं है?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि वर्षों से विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी कई इलाकों में बदली नहीं है। ऊर्जाधानी का दर्जा तभी सार्थक होगा, जब यहां रहने वाले लोगों को भी उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप बुनियादी सुविधाएं मिलें।
अब जरूरत केवल घोषणाओं की नहीं, बल्कि ठोस और जवाबदेह कार्रवाई की है, ताकि देश को रोशनी देने वाला कोरबा स्वयं भी विकास और सुविधाओं की रोशनी से जगमगा सके।
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