
25 दिन से तड़प रहा पीड़ित परिवार, लेकिन कुर्सी के घमंड में डूबे जनप्रतिनिधि को नहीं दिखा जनता का दर्द
कोरबा। जिले के HTPP दर्री क्षेत्र के झाबु राखड़ डेम में विगत दिनों हुए दर्दनाक हादसे में एक युवक की मौत ने पूरे गांव को झकझोर कर रख दिया, लेकिन हैरानी की बात यह है कि 25 दिन बीत जाने के बाद भी क्षेत्र के विधायक प्रेमचंद पटेल का दिल नहीं पसीजा। न पीड़ित परिवार के आंसू दिखाई दिए, न गांव का दर्द और न ही घटना स्थल तक पहुंचने की जरूरत महसूस हुई। विधायक पटेल की इस बेरुखी और संवेदनहीनता को लेकर ग्रामीणों में जबरदस्त गुस्सा फूट पड़ा है।
ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के समय घर-घर जाकर हाथ जोड़ने वाले विधायक प्रेमचंद सत्ता मिलते ही जनता को भूल बैठे हैं। हादसे में एक जवान बेटे को खो चुके परिवार की चीखें और मातम भी जनप्रतिनिधि तक नहीं पहुंच सका। गांव वालों का आरोप है कि विधायक पूरी तरह सत्ता के नशे में चूर होकर जनता से कट चुके हैं और उन्हें अब सिर्फ राजनीति और दिखावा दिखाई देता है।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर एक जनप्रतिनिधि का कर्तव्य क्या सिर्फ चुनावी मंचों तक सीमित है? क्या जनता का दर्द, मौत और मातम अब नेताओं के लिए कोई मायने नहीं रखता? 25 दिनों में विधायक के पास पीड़ित परिवार के आंसू पोंछने तक का समय नहीं निकला, जिससे लोगों में भारी आक्रोश व्याप्त है।
गांव के लोगों ने विधायक के खिलाफ खुलकर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि अगर जनता के दुख में साथ खड़े नहीं होना था तो वोट मांगने भी नहीं आना चाहिए था। लोगों का कहना है कि हादसे के बाद पूरे गांव ने विधायक का इंतजार किया, लेकिन वे नहीं पहुंचे। इससे साफ हो गया कि सत्ता की कुर्सी ने उन्हें जनता से पूरी तरह दूर कर दिया है।
पीड़ित परिवार को प्रशासन के प्रयास से भले ही मुआवजा राशि दिलाया गया लेकिन जनप्रतिनिधि की चुप्पी ने लोगों का भरोसा तोड़ दिया है। अब गांव में एक ही चर्चा है—“जनता मरती रही और विधायक सत्ता के नशे में सोते रहे।”
इस संबंध में जब कटघोरा विधायक प्रेमचंद पटेल से कलेक्ट्रेट परिसर में बात किया गया तो उन्होंने बेबाक अंदाज में कहा की मृतक क्षेत्र का निवासी नहीं है,जब उनसे ये पूछा गया कि हादसा तो आपके विधानसभा क्षेत्र में हुआ है तब उन्होंने अपने दिए गए वक्तव्य सुधारने की कोशिश करते हुए कहा मैं बाहर था।माननीय जी सबसे बड़ा सवाल ये है की मान भी लिया जाए कि आप बाहर थे तो आने के बाद भी आपने अब तक ग्रामीणों की समस्या जानने क्यों नहीं पहुंचे जो आज भी राख के गुब्बारे से परेशान हैं,क्या आपने सत्ता के नशा इस कदर मगन हैं की ग्रामीणों की समस्या सुनने या जानने उचित नहीं समझा।अब देखने वाली बात ये है कि आपके अंतरात्मा कब जागती है और ग्रामीणों की सुध लेने कब उनके पास पहुंचते हैं।



