छत्तीसगढ़देश

डरा-सहमा है धरती का भगवान, सीरियस पेशेंट भर्ती लेने से होने लगा परहेज

“डॉक्टर को धरती का दूसरा भगवान कहा जाता है लेकिन वह भी इंसान है, यथार्थ भगवान नहीं, लेकिन अपने मरीज की जान बचाने का जुनून उसमें कम नहीं होता।” कोई भी चिकित्सक अपने यहां आने वाले मरीज की जान बचाने के लिए आवश्यक प्रयास करता है किंतु विधाता की होनी-अनहोनी के आगे वह भी कई बार बेबस हो जाता है। ऐसे हालातों में कभी-कभी डॉक्टर को कई तरह की असामान्य, अप्रत्याशित और हिंसक घटनाओं का सामना करना पड़ता है। यह चिकित्सा समाज खुद को काफी डरा हुआ महसूस करने लगा है। अगर धरती का भगवान ही डरा-सहमा रहेगा तो भला वह रिस्क लेकर दूसरों के जीवन की रक्षा कैसे कर सकेगा..?

डर के साए में डर-डर कर इलाज करने वाले कई चिकित्सकों ने तो अब गंभीर मामलों के मरीज को अपने यहां भर्ती लेने से परहेज करना भी शुरू कर दिया है। ऐसे में उस गंभीर मरीज के लिए, उसके परिजनों के लिए परेशानी तब और बढ़ सकती है जब उसे बिलासपुर, रायपुर या अन्य दूसरे शहरों में ले जाना पड़े जबकि उसे अपने ही शहर के अस्पताल में तात्कालिक उपचार की आवश्यकता होती है ताकि आने-जाने में लगने वाला समय बर्बाद ना हो और उसका उपचार प्रारंभ हो सके। गोल्डन ऑवर में इलाज की सुविधा मिल जाने से कई बार मरीजों की प्राण रक्षा हो सकती है किंतु जब चिकित्सक समाज डरा हुआ है तो वह कोई भी रिस्क लेकर किसी क्रिटिकल केस में इलाज करने से अब परहेज करने लगा है। ऐसी स्थिति न सिर्फ समाज के लिए बल्कि किसी भी गंभीर मरीज और उसके परिवार के लिए चिंताजनक हो सकती है। जरूरत है कि मरीज, उसके परिजन और डॉक्टर के बीच विश्वास प्रगाढ़ हो ना कि कमजोर। हालांकि कुछ चिकित्सक अपवाद हो सकते हैं लेकिन 99% चिकित्सकों की मंशा अपने पेशे से पूर्ण ईमानदारी और मरीज के जीवन की रक्षा की होती है।

हाल-फिलहाल की घटनाओं के बाद इमरजेंसी में आए मरीज को अगर डॉक्टर ने रिस्क लेकर भर्ती किया और दुर्भाग्यवश उसकी मृत्यु हो गई तो अस्पताल में हंगामा तय है। ऐसे में डॉक्टरों की सोच बदल रही है कि वे”जान बचाने का जोखिम उठाएं या खुद को सुरक्षित रखें?”अगर डॉक्टर इलाज न करें तो जान का खतरा,अगर डॉक्टर इलाज करें और कुछ अनहोनी हो तो खुद व स्टाफ संकट में फंस सकता है। इस दुविधा ने इलाज की प्रक्रिया को जटिल बना दिया है।

मरीज और डॉक्टर के बीच दरार क्यों?
घटनाओं के बाद होने वाली भीड़ की हिंसा और हंगामे ने डॉक्टरों को डरा दिया है। सोशल मीडिया पर अधूरी जानकारी के आधार पर बदनाम करने की प्रवृत्ति हावी होती जा रही है। प्रशासनिक सुरक्षा की कमी के कारण भी डॉक्टर खुद को असुरक्षित मानते हैं।

डॉक्टर पर भरोसा रखें क्योंकि वही अंतिम उम्मीद है
एक ईमानदार डॉक्टर हर बार अपने मरीज की जान बचाने की पूरी कोशिश करता है। उसकी गलती जानबूझ कर नहीं होती और उसकी कोशिश को अपराध न बनाएं। मरीज का इलाज कराने से पहले उसकी स्थिति और इलाज की प्रकृति के बारे में बेहतर तरीके से चिकित्सक से सारी जानकारी प्राप्त करने और भली-भांति समझना परिजनों के लिए भी आवश्यक है। विपरीत हालातो में धैर्य का परिचय दें क्योंकि कोई भी डॉक्टर किसी मरीज को मारना नहीं चाहता। परिजन चाहें तो विपरीत हालातों में कानून का सहारा ले सकते हैं, पर कानून हाथ में ना लें।

घटता है चिकित्सकों का मनोबल
कोरबा सहित प्रदेश व देश भर में चिकित्सा क्षेत्र को लेकर अनेक दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें इलाज के दौरान किसी अनहोनी पर डॉक्टरों को जिम्मेदार ठहराया गया है। यह प्रवृत्ति न केवल चिकित्सा समुदाय के मनोबल को तोड़ रही है, बल्कि आमजन के लिए भी गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव अब यह देखने को मिल रहा है कि चिकित्सक गंभीर मरीजों को भर्ती करने से भी हिचकिचाने लगे हैं। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। यह डर डॉक्टरों को मानसिक रूप से कुंठित कर रहा है।

परिस्थितियों को समझने की ज़रूरत
समाज को यह स्वीकार करना होगा कि हर आपातकालीन मरीज को बचा पाना संभव नहीं होता, विशेषकर तब जब वह पहले से ही अत्यंत गंभीर स्थिति में हो। डॉक्टर कोई भगवान नहीं है, लेकिन वह भगवान का माध्यम जरूर है। यदि समाज डॉक्टरों पर विश्वास खो देगा, तो इलाज की व्यवस्था ही चरमरा जाएगी।
जरूरी है कि चिकित्सकों पर विश्वास बनाए रखें। उन्हें भयमुक्त होकर सेवा देने दें। किसी भी दुर्भाग्यपूर्ण घटना पर त्वरित आरोप न लगाएं, पहले पूरी परिस्थिति समझें। अस्पतालों में सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ किया जाए, ताकि डॉक्टर बिना डर के इलाज कर सकें। एक स्वस्थ समाज के लिए यह आवश्यक है कि डॉक्टर और मरीज दोनों एक-दूसरे के सहयोगी बनें, न कि विरोधी।

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