छत्तीसगढ़

हलषष्ठी व्रत कल, पुत्र के दीर्घायु की कामना के लिए महिलाएं रखती है व्रत

छत्तीसगढ़ मे हरियाली त्यौहार के साथ ही तीज त्यौहारो की तैयारी एवं उत्सव मनाने के शुरुआत हो जाती है । इसी कड़ी मे सावन पूर्णिमा के बाद भाद्र कृष्ण पक्ष के छठ को हलषष्ठी का पर्व आता है जिसमे महिलाओ के द्वारा अपने संतान की दीर्घायु और मंगलकामना हेतु व्रत रखा जाता है। इस व्रत के माध्यम से संतानहीन महिलाये पुत्र प्राप्ति की कामना करते है तथा व्रत के माध्यम से छठ माता से पुत्र की वरदान मांगती है हरछठ माता सबकी झोली भरने वाली मानी जाती है अलग अलग प्रदेश मे इसे अलग तरीके से भी मनाते है परन्तु छत्तीसगढ़ का यह पर्व बड़ा ही मार्मिक है एवं धार्मिक रीति रिवाज़ से किया जाने वाला व्रत है जो छत्तीसगढ़ के वात्सल्य भावना को प्रदर्शित करती है जो की छत्तीसगढ़ प्रदेश की अलग पहचान बनाती है।

हलषष्ठी का महत्व इसलिए और भी बड़ जाता है क्योंकि इसी दिन वासुदेव और रोहिणी के पुत्र बलराम का जन्म हुआ था जिसे हलधर भी कहते है कयोकि बलराम को शस्त्र मे मुसल और हल दोनों काफ़ी पसंद है इसलिए बलराम का एक नाम हलधर भी है इस कारण भी इस दिन का बड़ा महत्व है । इसी कारण ही इसे इस दिन की पूजा अर्चना का विशेष महत्व पहले से ही है । इसी कारण ही इसे हलषष्ठी भी कहते है जिसे हमारे छत्तीसगढ़ मे कमरछठ भी कहते है । इस कारण भी इस दिन पूजा अर्चना का विशेष आयोजन का होना पहले से महत्वपूर्ण है इस दिन व्रत के माध्यम से बलराम जैसे पुत्र प्राप्ति की कामना से व्रत रखते है।हरछठ माता से बलशाली पुत्र प्राप्ति हेतु माता महिलाये आशीर्वाद लेती है।बलराम जी के जन्मदिन के कारण ही इसका एक नाम हलछठ भी है।यह व्रत सभी पुत्रवती महिलाओ को व्रत अवश्य रखना चाहिए क्योंकि इस व्रत का पुण्यफल संतान को प्राप्त होता है।

इस दिन महिलाये केवल पसही (पसहेर ) का चावल को ही प्रसाद स्वरूप ग्रहण करती है दही के साथ ही सात प्रकार की अलग भाजीयो की सब्जिया बनाते है शाम को उसी प्रसाद से व्रत खोलती है इस दिन महिलाये पांच या सात प्रकार की आनाज से छोटे छोटे बर्तन मे पुत्र के हिसाब के भरती है।इस दिन गाय का दूध वर्जित है इस व्रत मे भैस का दूध और दही का इस्तेमाल किया जाता है। महुआ को खाया जाता है इस दिन दातुन महुवा का किया जाता है । इस व्रत मे लाइ के  साथ साथ महुआ और नारियल को पूजा मे शामिल किया जाता है पूजा अर्चना पश्चात लाई नारियल और महुआ को प्रसाद के रूप मे वितरण किया जाता है।

व्रत – इस दिन महिलाये सुबह से नये वस्त्र धारण करती है एवं पूजा अर्चना की तैयारी करती है जिसमे दूध,दही,लाई महुआ, नारियल,अक्षत चंदन, ग़ुलाल आदि की तैयारी कर दोपहर मे चौक मे सगरी निर्माण कर मोहल्ले की सभी महिलाये सगरी भरती है एवं पूजा अर्चना कर वही पर ब्राह्मण देव से हरछठ माता की कथा का श्रवण करती है शाम को घर आकर पुनः पूजा अर्चना करती है और घर में दीपक जलाकर प्रसाद वितरण से पहले अपने बच्चों को पोती मारती है (पोती मतलब हल्दी लगा हुआ कपास होता है जो पूजा मे इस्तेमाल किया गया होता है उसे अपने बच्चो की पीठ मे मारती है कहा जाता है इस प्रकार पोती मारने से संतान पर आने वाली सारी विपदाए नस्ट हो जाती है उनका मंगल होता है )तदुउपरांत बडे बुजुर्गो का आशिर्वाद लेकर सर्वप्रथम प्रसाद का हिस्सा गाय के लिए फिर अपने खो चुके अर्थात दिवंगत हो चुके पुत्र-पुत्री के लिए भी हिस्सा निकालती है उसके बाद घर के सभी लोगो को प्रसाद वितरण पश्चात स्वयं पसही चांवल,दही,भाजी के माध्यम से व्रत खोलती है और प्रसाद ग्रहण करती है।

आस्था और विस्वास का यह व्रत छत्तीसगढ़ की एक अलग ही पहचान को प्रदर्शित करती है । यह पर्व पुत्र के लोक कल्याण और मंगल कामना के लिया किया जाना वाला सबसे बड़ा व्रत है । इस व्रत के माध्यम से महिलाये अपने संतान की उज्जवल भविष्य और उनके दीर्घायु हेतु विशेष विधि विधान से पूजा अर्चना कर अपने मातृ धर्म का निर्वहन भलीभांति करती है ।माताएँ अपने संतान को बलराम के जैसे श्रेष्ठ और बलशाली बनाने के मंगल कामना करती है । कमरछठ का त्यौहार छत्तीसगढ़ का एक बहुत महत्वपूर्ण त्यौहार है जिसमे माताएँ अपने पुत्र के कुशल मंगल की कामना करती है और यह कब लोक कल्याण से जुड़कर कब राष्ट्र कल्याण मे तब्दील हो जाती है पता भी नहीं चलता है और एक दिन यह लोक मंगल की भावना मे परिवर्तित हो जाती है जिससे समस्त जग का कल्याण होता है।समस्त महिलाओ को हलषष्ठी की हार्दिक शुभकामनायें ।

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